ganga dashmi/ganga dashara ki kahani hindi निरंतर कर्म की प्रेरणा देता है माँ गंगा के अवतरण का दिन गंगा दशमी

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ganga dashmi/ganga dashara ki kahani hindi निरंतर कर्म की प्रेरणा देता है माँ गंगा के अवतरण का दिन गंगा दशमी

नमस्कार दोस्तों, गंगा नदी का नाम तो आप सबने सुना होगा| हिन्दू धर्म में गंगा को माँ का स्थान प्राप्त है| इस मोक्षदायिनी नदी माना गया है| इसके साथ ही गंगा का भारत के आर्थिक और भौगोलिक दोनों ही क्षेत्रों में विशेष महत्व है| पर आज हम यहाँ गंगा दशमी के पावन पर्व गंगा के धरती पर अवतरण की पावन कथा ganga dashmi/ganga dashara ki kahani hindi के बारे में जानेंगे| 

शास्त्रों के अनुसार गंगा भगवान विष्णु के पैरो से उत्पन्न हुई इस कारण उन्हें विष्णुपदी भी कहा जाता है| 

भविष्य में उन्होंने राजा हिमालय और रानी मैना के घर पार्वती की बड़ी बहन गंगा के रूप में जन्म लिया|

गंगा स्वभाव से अत्यंत स्वतंत्र प्रवृति की थी| उसे किसी भी प्रकार के बंधन स्वीकार नहीं थे, साथ ही वह दैवीय शक्तियों से भी युक्त थी|

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एक बार  देवराज इंद्र ने गंगा को देखा और उसकी दैवीय शक्तियों से प्रभावित हुए| तथा संसार के कल्याण के लिए उसे अपने साथ स्वर्ग चलने का प्रस्ताव रखा| जिसे गंगा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया|

तब से गंगा स्वर्ग में रहने लगी और देवनदी, सुरसरि,देवपगा आदि नामों से प्रसिद्द हुई|

ये तो गंगा के स्वर्ग में जाने की कथा है लेकिन गंगा के धरती पर आने की कथा इससे भी रोचक है| जो न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है  बल्कि किसी भी साधारण व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरंतर अथक प्रयास करने की प्रेरणा देने वाली कहानी है|

गंगा के धरती पर अवतरण की कथा शुरू होती है श्री राम के पूर्वज अयोध्या के राजा सगर के समय से|

राजा सागर की दो पत्नियां थी केशिनी और सुमति | ऋषि भृगु के आशीर्वाद से केशिनी के एक पुत्र हुआ जिसका नाम असमंजस रखा गया| और सुमति के गर्भ से एक तुम्बा निकला जिससे बाद में 60000 पुत्र उत्पन्न हुए|

असमंजस की  दुष्ट प्रवृतियों के कारण राजा सागर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया|  कुछ समय बाद उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया जिसके लिए उन्होंने श्यामकर्ण नामक घोड़ा छोड़ा|

पर राजा सगर के बढ़ते प्रभाव को देख कर इंद्र ने यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया और उसे पाताललोक में कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया|

यज्ञ का घोड़ा गायब हो जाने पर राजा सगर ने अपने 60000 पुत्रों को घोड़ा खोज कर घोड़ा चुराने वाले को जीवित या मृत उनके सामने प्रस्तुत करने का आदेश दिया|

राजा सगर के पुत्रों ने सम्पूर्ण धरती पर खोजने के उपरांत पाताललोक की ओर गमन किया| पाताललोक में कपिल मुनि के आश्रम के बाहर उन्होंने यज्ञ के घोड़े को बंधा हुआ पाया|

उस समय कपिल मुनि तपस्या में लीन थे| उन्हें इन सब घटनाओं के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं था|

राजा सगर के पुत्रों ने बिना पूरी बात जाने कपिल मुनि को चोर समझ लिया और कपिल मुनि को अपशब्द कहने लगे और उनका अपमान करने लगे जिससे कपिल मुनि की तपस्या भंग हो गयी और उन्होंने अपने नेत्रों की दिव्य ज्योति से राजा सगर के सभी 60000 पुत्रों को तत्काल भस्म कर दिया| और वे सब राख में बदल गए|

ये बात राजा सगर को पता नहीं थी | उन्होंने अपने पुत्र असमंजस के पुत्र अंशुमन को अपने 60000 पुत्रों की खोज के लिए भेजा |

बड़े प्रयासों के बाद अंशुमन कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे | जहाँ  गरुड़ जी ने उन्हें उनके चाचाओं के भस्म होने के बारे में बताया|

अंशुमन ने गरुड़ जी से अपने चाचाओं के उद्धार के विषय में पूछा तब गरुड़ जी ने कहा किये सब अलौकिक शक्ति वाले दिव्य पुरुष के द्वारा भस्म किये गये हैं अतः लौकिक जल से तर्पण करने से इनका उद्धार नहीं होगा, केवल हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगा के जल से ही तर्पण करने पर इनका उद्धार सम्भव है।

तब अंशुमन ने श्यामकर्ण घोड़े को लाकर राजा सगर को सौंपा | राजा सगर ने दुखी मन से अपना यज्ञ पूर्ण किया|वे अपने पुत्रों के उद्धार करने के लिये गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे पर ऐसा करने के लिये उन्हें कोई भी उपाय नहीं सूझा|

कुछ वर्षों बाद राजा सगर की मृत्यु हो गयी| उनके बाद अंशुमन अयोध्या का राजा बना|

और कुछ वर्षो के बाद जब राजा अंशुमन का पुत्र दिलीप बड़ा हुआ तो उन्होंने अपना राज्य उसे सौंप कर गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या करना प्रारम्भ किया| पर उन्हें कोई  सफलता नहीं मिली|

इसी तरह राजा दिलीप ने भी अपने पुत्र भागीरथ के बड़े हो जाने पर सिंहासन उसे सौंप कर तपस्या प्रारंभ की पर राजा दिलीप को भी सफलता नही मिली| और उनकी मृत्यु हो गयी |

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अंतिम संस्कार न किये जाने के कारण सगर के पुत्रों की आत्माएं प्रेत बनकर विचरने लगीं। जब दिलीप के पुत्र और सगर के एक वंशज भगीरथ ने इस दुर्भाग्य के बारे में सुना तो उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे गंगा को पृथ्वी पर लायेंगे ताकि उसके जल से सगर के पुत्रों के पाप धुल सकें और उन्हें मोक्ष प्राप्त हो सके।

राजा भगीरथ के कोई पुत्र नहीं था इसलिए वे अपने राज्य का भार मन्त्रियों को सौंपकर स्वयं गंगा को धरती पर लाने के लिए गोकर्ण नामक तीर्थ पर जाकर कठोर तपस्या करने लगे।

अलग अलग कथाओ के अनुसार कहा जाता है कि उन्होंने सबसे पहले गंगा की तपस्या की| गंगा ने उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर उनसे वरदान मांगने को कहा|

भागीरथ ने कहा कि माता आप पाताललोक में चल कर मेरे पूर्वजों का उद्धार कीजिये |

तब गंगा जी ने कहा कि मैं धरती पर आ तो जाउंगी लेकिन उसके लिए पहले तुम्हे ब्रह्मा जी की तपस्या करनी पड़ेगी क्योंकि विष्णु के पैरो से निकलने का बाद मैं ब्रह्मा जी के कमंडल में रहती हूँ |

इसके बाद भागीरथ ने  कई वर्षो तक ब्रह्मा जी की तपस्या की| उनकी अभूतपूर्व तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वर माँगने के लिये कहा।

भगीरथ ने ब्रह्मा जी से कहा कि हे प्रभु ! मुझे मेरे पूर्वजो के उद्धार के लिए गंगा जल दीजिये । इसके अतिरिक्त मुझे सन्तान प्राप्ति का भी वर दीजिये ताकि इक्ष्वाकु वंश नष्ट न हो।

ब्रह्मा जी ने कहा कि सन्तान का तेरा मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा, किन्तु तुम्हारे माँगे गये प्रथम वरदान को देने में कठिनाई यह है कि जब गंगा  वेग के साथ पृथ्वी पर अवतरित होंगीं तो उनके वेग को पृथ्वी संभाल नहीं सकेगी। और गंगा सीधे ही पाताललोक में चली जाएगी|

गंगा जी के वेग को संभालने की क्षमता महादेव के अतिरिक्त किसी में भी नहीं है। इसके लिये तुम्हें महादेव को प्रसन्न करना होगा। इतना कह कर ब्रह्मा जी अंतर्ध्यान हो गए|

तब एक वर्ष तक भगीरथ ने पैर के अंगूठे के सहारे खड़े होकर महादेव  की तपस्या की। इस दौरान उन्होंने वायु के अलावा अन्य किसी भी चीज़ को  ग्रहण नहीं किया।

उनकी  इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें दर्शन दिए और बोले, “हे भागीरथ ! मैं  तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ । मैं तुम्हारी मनोकामना को पूरा करूंगा, स्वर्ग लोक में बहने वाली गंगा को मैं अपने मस्तक पर धारण करूंगा।

यह सूचना जब गंगा जी तक पहुंची तो वह चिंतित हो गईं, क्योंकि वह सुरलोक छोड़ कहीं जाना नहीं चाहती थीं।

परन्तु  ब्रह्मा जी द्वारा दिए गए वरदान का मान रखने के लिए उन्होंने योजना बनाई कि वह अपने प्रचण्ड वेग से शिव जी को बहा कर पाताल लोक ले जाएंगी।

भागीरथ के वरदान को फलीभूत करने के लिए विष्णु के पैरो से निकली  गंगा को ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में धारण किया और उसके बाद स्वर्ग से धरती की और नीचे छोड़ा| गंगा भयानक वेग से शिव जी के सिर पर अवतरित हुईं लेकिन शिव जी गंगा की मंशा को समझ चुके थे।

गंगा को अपने साथ बांधे रखने के लिए शिव जी ने अपनी जटाएं खोल दी और गंगा की धाराओं को अपनी जटाओं में धीरे-धीरे बांधना शुरू कर दिया। अब गंगा इन जटाओं से बाहर निकलने में असमर्थ थीं।

देवी गंगा को इस प्रकार शिव जी की जटाओं में विलीन होते देख भगीरथ ने फिर शिव जी की तपस्या की।

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भगीरथ के इस तपस्या से शिव जी फिर से प्रसन्न हुए और आखिरकार गंगा जी को हिमालय पर्वत पर स्थित बिन्दुसर में छोड़ दिया।

यह स्थान वर्तमान में गंगोत्री के नाम से जाना जाता है| 

शिव की जटाओं से निकलते ही गंगा छूटते ही सात धाराओं में बंट गईं। इन धाराओं में से पहली तीन धाराएं ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व की ओर प्रवाहित हुईं। अन्य तीन सुचक्षु, सीता और सिन्धु धाराएं पश्चिम की ओर बहीं और आखिरी एवं सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे-पीछे चल पड़ी। भागीरथ  जहां भी जाते वह धारा उनका पीछा करती।

भागीरथ अपने पूर्वजो का उद्धार करने के लिए उन्हें पाताललोक की तरफ ले जा रहे थे| मार्ग में ऋषि जह्नु ऋषि का आश्रम था | भगीरथ जब वहां से गुजरे तो ऋषि जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगा जी बहते हुए अनजाने में उनके यज्ञ की सारी सामग्री को अपने साथ बहाकर ले गईं, जिस पर ऋषि को बहुत क्रोध आया और उन्होंने क्रुद्ध होकर गंगा का सारा जल पी लिया।

अपने इतने वर्षो की तपस्या को विफल होता देख भागीरथ दुखी हो गये| उन्होंने ऋषि से गंगा को मुक्त करने की प्रार्थना की| 

अंत में ऋषि जह्नु ने अपने कानों से गंगा जी को बहा दिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब से गंगा जी का नाम जाह्नवी भी पड़ा।

इसके पश्चात् वे भगीरथ के पीछे चलते-चलते पाताललोक में उस स्थान पर पहुंचीं, उनके पूर्वजो की राख पड़ी थी। उस राख का गंगा के पवित्र जल से मिलन होते ही सगर के सभी पुत्रों की आत्मा स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गई।

तब से गंगा त्रिपथगा कहलाने लगी क्योंकि गंगा अकेली ऐसी नदी थी जो स्वर्ग से धरती और फिर पाताललोक तक पहुंची थी | 

राजा भागीरथ के अपने लक्ष्य के प्रति निरंतर और अथक प्रयासों, अदम्य साहस और दृढ संकल्प के कारण ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को जिसे गंगा दशमी या गंगा दशहरा भी कहा जाता है, गंगा का इस धरती पर आगमन हुआ| 

इस प्रकार राजा भागीरथ के इस महान कार्य के कारण ही गंगा का एक नाम भागीरथी भी पढ़ा| उनके इस कार्य के कारण ही ब्रह्मा जी उन्हें आशीर्वाद दिया कि जब गंगा इस धरती पर बहेगी तब तक सम्पूर्ण संसार उनके प्रयास और कीर्ति का वर्णन करेगा|

गंगा दशमी के दिन हम भी संकल्प ले कि हमारा लक्ष्य चाहे धार्मिक हो या भौतिक| हम भागीरथ के समान अपने लक्ष्य में कई परेशानी प्राप्त करने के बाद निरंतर उस कार्य को करते ही रहे, जब तक की हम अपने कार्य में सफल न हो जाये|

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 नोट – यहां साझा की गई जानकारी ganga dashmi/ganga dashara ki kahani hindi मैंने धार्मिक ग्रंथो  से  प्राप्त कर के लिखा है  Kahani Sansar का मूल उद्देश्य कहानियो के माध्यम से समाज को प्रेरित करना और अपने पाठको का मनोरंजन करना है|

 

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